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Living Feminisms
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पुलिस की नज़र में बच्चे ही दोषी

संवाद
by शिवम विज
प्रस्तुत लेख में 2013 में ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा जारी रिपोर्ट "ब्रेकिंग द साइलेंस: चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज इन इंडिया" के निष्कर्षों का संक्षेप में वर्णन किया गया है। इस रिपोर्ट में बाल यौन उत्पीड़न को रोकने और उससे निपटने के लिए सरकारी तंत्रों के निरीक्षण हेतु संख्यात्मक विश्लेषण के बजाय असल केस-कथाएं उपयोग की गई हैं।
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बच्चों की हिफ़ाज़त हम सबकी ज़िम्मेदारी

अभियान
by किशोर झा
दिल्ली बाल अधिकार समूह द्वारा जारी इस पर्र्ची में बच्चों के खिलाफ हो रही हिंसा से जुड़े आंकड़ों; कानूनी प्रावधान, कार्यक्रम और सेवाओं पर जानकारी दी गई है।
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बच्चों की सुरक्षा, हम सबकी ज़िम्मेदारी

आमने-सामने
by किशोर झा
इस लेख में नीति, कानून, जागरूकता, सशक्तिकरण, संवेदनशीलता इत्यादि के माध्यम से भारत में बच्चों के लिए एक सुरक्षित परिवेश सुनिश्चित करने की गंभीर आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है।
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सिर्फ़ कानून बनाना काफ़ी नहीं

आमने-सामने
by मारिया रोज़ारियो-चेनत्रोने
'पॉक्सो' कानून का पास होना बच्चों के लिए एक सुरक्षित परिवेश सुनिश्चित करने की दिशा में एक अत्यंत सकारात्मक कदम है पर इस कानून का बन जाना बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न की समस्या को हल करने की अंतिम कड़ी कदापि नहीं है। अब राज्य और केंद्र सरकार पर यह ज़िम्मेदारी आती है कि वे समय समय पर सामान्य जनता ख़ास कर बच्चों को इस कानून के प्रावधानों के बारे में जागरूक करें तथा इस कानून का कुशल कार्यान्वयन सुनिश्चित करें।
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दावणी

कहानी
by बामा
पढ़िए दलित साहित्य की जानी-मानी लेखिका बामा की रचित वर्ग व शोषण सम्बन्धी मुद्दों पर आधारित कहानी- दावणी (केरल में पहनी जाने वाली साड़ी)।
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सहमति से यौन सम्बन्ध बनाने की आयु सीमा बढ़ाने का फैसला: एक समीक्षा

by साहिल अरोड़ा और चितवन दीप सिंह
इस लेख में कानूनी प्रावधानों में सहमति से होने वाली यौन गतिविधियों की उम्र 16 वर्ष कर दी जाने के फैसले की समीक्षा प्रस्तुत है। यह फैसला इस तर्क के बल पर लिया गया है कि यह कदम बाल अधिकारों के पक्ष में होने के साथ-साथ इस विषय में अंतर्राष्ट्रीय चलन के अनुकूल भी होगा। पर क्या यह फैसला भारतीय समाजिक सच्चाइयों को अनदेखी नहीं करता? आगे पढ़िए...

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लिविंग फेमिनिज़्म्स नई दिल्ली स्थित नारीवादी संगठन जागोरी के पास अस्सी के दशक से सुरक्षित दस्तावेजों को साझा करने की एक चेष्टा है। इसमें हमारी क्यूरेटर्स के अनुभव, विभिन्न प्रकाशन, गीतों के संकलन, पर्चे, पोस्टर, फोटोग्राफ और कविताएं आदि विधि प्रकार की सामग्री शामिल है। ये दस्तावेज और अनुभव स्वायत्त भारतीय महिला आंदोलन, उसके संघर्षों, एकजुटताओं और मतभेदों, ठहाकों, गुस्सों, लापरवाही के पलों, अभियानों, मोहब्बत, नुकसान, काम और घर, सबकी एक विविधतापूर्ण शृंखला के दर्शन कराते हैं।

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