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पहली बूंदों का बरसना-कच्ची मिट्टी का मेहकना

पुस्तक परिचय
by जुही जैन
प्रस्तुत है 'किनारों पर उगती पहचान: फारकों की राजनीति के नए नारीवादी आयाम' नामक पुस्तक के कुछ अंश। आभा भैया द्वारा सम्पादित यह पुस्तक समाज के हाशिए पर जीने वाली एकल औरतों के जीवन का दस्तावेज़ है।
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देवी-स्त्री यौनिकता

by अनामिका
पौराणिक रचनाओं से विभिन्न देवियों (पारवती, राधा, द्रौपदी, सीता आदि) के चरित्र वर्णना को उदाहरणस्वरूप पेश करते हुए प्रस्तुत लेख इस बात को उजागर करता है की वे सभी अपनी यौनिकता की अभिव्यक्ति, अपने चयन, अपनी देह और अपनी रुचि को महत्त्व देती हैं। यह इस बात को भी दर्शाता है की स्त्रियों को यौन संतुष्टि ऐसे ही साथी से मिल सकती है जिसका उनसे गहरा मानसिक व बौद्धिक जुड़ाव हो। आदरपूर्वक, मीठी, उड़ान भरी बातें और काव्य-संगीत-नृत्यादि की समझ से स्त्रियों/देवियों की यौनिकता स्पंदित होती है।
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जुग-जुग जियेसु ललनवा

आमने-सामने
by शशिकला राय
पढ़िए कोरियोग्राफर, नर्तिका व सामजिक कार्यकर्ता लक्ष्मी की कहानी। लक्ष्मी, स्वेच्छा से हिजड़ा समुदाय में शामिल हुई एक ट्रांसजेंडर औरत हैं जो हिजड़ों के विकास, सम्मान व सामान अधिकारों के लिए कार्य करती हैं।
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सही या गलत के घेरे में 'पोर्नोग्राफ़ी'

संवाद
by जुही जैन
पोर्नोग्राफी विमर्श विभिन्न स्तरीय बहसों और चर्चाओं के केंद्र में है। पोर्नोग्राफी के प्रसंग में नैतिकता, सभ्यता, यौन अभिव्यक्ति व शरीर पर अधिकार जैसे कई पेहलु सामने आती हैं। प्रस्तुत लेख में इस मुद्दे से जुड़े विविध विचारधाराओं की समीक्षा की गई है।
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एक ऐतिहासिक जीत

संवाद
by आपका पिटारा
जुलाई 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय क़ानून की धारा 377 को असंवैधानिक करार देते हुए इसे ख़ारिज करने का फैसला सुनाया था। 1860 में अंग्रेज़ों के ज़माने में बनाए गए इस कानून के तहत किसी भी 'अप्राकृतिक' (जो प्रजनन से जुड़ी न हो) यौन सम्बन्ध को अपराध माना जाता है। वयस्क यौन स्वतंत्रता के सन्दर्भ में यह एक सुनहरा दिन था। लेकिन दुर्भाग्यवश दिसंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहते हुए कि धारा 377 के संशोधन या निरसन से जुड़े मामले को संसद के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए न कि न्यायपालिका पर, इस फैसले को उलट दिया।
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आज़ादी की राह पर

संवाद
by गौतम भान
प्रस्तुत लेख दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा जुलाई 2009 में भारतीय क़ानून की धारा 377 को ख़ारिज करने के फैसले का जश्न मनाता है। 1860 में अंग्रेज़ों के ज़माने में बनाया गया यह कानून किसी भी 'अप्राकृतिक' (जो प्रजनन से जुड़ी न हो) यौन सम्बन्ध को अपराध करार देता है। वयस्क यौन स्वतंत्रता के सन्दर्भ में इस कानून का निरसन एक सुनहरा दिन था। लेकिन दुर्भाग्यवश दिसंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को उलट दिया। क्वियर नागरिकों की बराबरी, सम्मान और अधिकार पाने की लड़ाई अभी तक जारी है।

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लिविंग फेमिनिज़्म्स

लिविंग फेमिनिज़्म्स नई दिल्ली स्थित नारीवादी संगठन जागोरी के पास अस्सी के दशक से सुरक्षित दस्तावेजों को साझा करने की एक चेष्टा है। इसमें हमारी क्यूरेटर्स के अनुभव, विभिन्न प्रकाशन, गीतों के संकलन, पर्चे, पोस्टर, फोटोग्राफ और कविताएं आदि विधि प्रकार की सामग्री शामिल है। ये दस्तावेज और अनुभव स्वायत्त भारतीय महिला आंदोलन, उसके संघर्षों, एकजुटताओं और मतभेदों, ठहाकों, गुस्सों, लापरवाही के पलों, अभियानों, मोहब्बत, नुकसान, काम और घर, सबकी एक विविधतापूर्ण शृंखला के दर्शन कराते हैं।

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