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Living Feminisms
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संचार माध्यमों में औरतें

by वीणा शिवपुरी
संचार माध्यम लोगों तक लोगों की ज़ुबान में उन्हीं की समस्याओं के हल और सुझाव पहुँचाने का ताकतवर ज़रिया है इसलिए ज़रूरी है कि महिलाओं के विकास में उनका भरपूर उपयोग किया जाए। आगे पढ़िए...
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औरत की छवि: भाषा, संस्कृति और व्यवहार

by जुही जैन
यह लेख सदियों पुरानी रामायण-महाभारत व मनुस्मृति की कथाओं, जगह-जगह प्रचलित कहावतों और भाषा के उदाहरण पेश करते हुए दर्शाता है की हमेशा से ही समाज की नज़र में औरत का मान्य रूप अत्यंत अन्यायपूर्ण रहा है। प्रस्तुत लेख में इस पितृसत्तात्मक समाज द्वारा अपने राज को कायम रखने के लिए भाषा, संस्कृति व रिवाज़ों के दायरे में गढ़ी गई 'अच्छी औरत' की छवि की आलोचना की गई है।
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आठ मार्च: हमारा दिन, हमारा त्यौहार

by कमला भसीन
प्रस्तुत लेख 'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस' (आठ मार्च) के इतिहास पर रोशनी डालता है। साथ ही इस दिन को दिल्ली व भारत के अन्य जगहों पर मानाने की गतिविधिओं पर भी चर्चा करता है।
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संतुलित आहार ज़रूरी: महिलाओं के लिए भी

by टच मी टच मी नॉट
स्वास्थ्य सुधार में पोषण और खानपान के महत्व पर ज़ोर देते हुए प्रस्तुत लेख इस बात को उजागर करता है कि असंतुलित भोजन, बहुत ज़्यादा काम और शारीरिक व्यायाम की कमी तरह-तरह के दर्द को जन्म देता है।
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मानव अधिकार और महिलाएं

by सुहास कुमार
प्रस्तुत लेख बुनियादी मानव अधिकारों से जुड़ी जानकारी मुहैया कराते हुए महिलाओं के शरीर व यौनिकता से जुड़े उनके कुछ ख़ास अधिकारों पर भी बात करता है।
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पूर्वजों की सीख

कहानी
by सतीशराज पुष्करणा

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लिविंग फेमिनिज़्म्स

लिविंग फेमिनिज़्म्स नई दिल्ली स्थित नारीवादी संगठन जागोरी के पास अस्सी के दशक से सुरक्षित दस्तावेजों को साझा करने की एक चेष्टा है। इसमें हमारी क्यूरेटर्स के अनुभव, विभिन्न प्रकाशन, गीतों के संकलन, पर्चे, पोस्टर, फोटोग्राफ और कविताएं आदि विधि प्रकार की सामग्री शामिल है। ये दस्तावेज और अनुभव स्वायत्त भारतीय महिला आंदोलन, उसके संघर्षों, एकजुटताओं और मतभेदों, ठहाकों, गुस्सों, लापरवाही के पलों, अभियानों, मोहब्बत, नुकसान, काम और घर, सबकी एक विविधतापूर्ण शृंखला के दर्शन कराते हैं।

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